मिल्खा सिंह तलाशेंगे उड़न एथलीट


मिल्खा सिंह

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उड़न सिख मिल्खा सिंह भारत के 19 शहरों में 3000 से अधिक स्कूलों में 12 से 14 साल के युवा लड़के और लड़कियों को ‘द फास्टेस्ट इंडियन’ के लिए तैयार करने की मुहिम पर हैं.

साल 1958 में कार्डिफ राष्ट्रमंडल खेलों और साल 1958 के टोक्यो और साल 1962 के जकार्ता एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाले एथलीट मिल्खा सिंह दिल्ली में इस सिलसिले में आयोजित किए गए एक इवेंट में मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद थे.

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‘द फास्टेस्ट इंडियन’ नाम की इस मुहिम के फाइनल्स के विजेताओं को पोस्ट ग्रैजुएशन तक स्कॉलरशिप दी जाएगी. मिल्खा सिंह इस इवेंट के प्रमुख मेंटर होंगे और विजेताओं को प्रशिक्षित करने में मदद करेंगे.

भूली-बिसरी यादें ताज़ा करते हुए मिल्खा सिंह ने कहा कि वह भी इसी तरह की स्कीम चाहते थे.

उन्होंने कहा कि रोम ओलंपिक से पहले उन्होंने पूरी दुनिया में 80 में से 77 रेस जीती और वहां हारने का ग़म उन्हें मरते दम तक रहेगा.

एथलेटिक्स

मिल्खा सिंह ने कहा कि जो तिरंगा झंडा वह नही लहरा पाए, जो राष्ट्रीय धुन वह नही सुनवा पाए, वह काम कोई एथलीट करके दिखाए.

उन्होंने कहा कि निशानेबाज़ी, कुश्ती, बैडमिंटन और मुक्केबाज़ी में भारतीय खिलाड़ी ओलंपिक में अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन अभी भी एथलेटिक्स में भारत बहुत पीछे है.

पीटी उषा, श्रीराम सिंह, गुरबचन सिंह रंधावा और अंजू बॉबी जॉर्ज को याद करते हुए मिल्खा कहते हैं कि ये सब एथलीट भी बहुत क़रीब से ओलंपिक पदक चूक गए. इससे ये साबित होता है कि भारत में प्रतिभा की कोई कमी नही है.

प्रशिक्षकों की जरूरत

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मिल्खा भारतीय खेल इतिहास में उड़न सिख के नाम से मशहूर हैं.

उन्होंने कहा कि खिलाड़ियों अच्छी ट्रेनिंग नहीं मिल पा रही है और भारत को इस खेल में गंभीरता से काम करने वाले प्रशिक्षकों की ज़रूरत है, जो परिणाम दे सकें.

मिल्खा सिंह ने अपना उदाहरण देते हुए कहा कि उनके कोच हर हफ्ते उनकी रेस के परिणाम पर नज़र रखते थे.

हालांकि मिल्खा का मानना है कि राष्ट्रीय स्तर पर परिणाम देने के बाद एथलीट को सरकारी नौकरी मिलनी चाहिए.

उन्होंने इसी अवसर पर पुरस्कारों को लेकर कहा कि अभी तक कम से कम ऐसे 100 एथलीटों को अर्जुन पुरस्कार मिला है जो उसके लायक नही थे.

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