kashmir Handwara encounter expert analysis by Lieutenant General Syed Ata Hasnain | हमने हासिल करने से ज्यादा खोया है, ध्यान रहे ये मौसम घुसपैठ का है, हल यही होगा कि कम से कम घुसपैठ हो और ज्यादा से ज्यादा आतंकी मारे जाएं

  • इनपुट हैं कि पाकिस्तान साउथ कश्मीर की जगह अब नॉर्थ कश्मीर में आतंकवादियों को एक्टीवेट करना चाहता है
  • जम्मू-कश्मीर में 1 अप्रैल से अब तक 30 आतंकी मारे गए हैं, पर दो घटनाओं में हमने 10 सैनिकों को खोया है

ले. जनरल (रिटा.) सैयद अता हसनैन

May 04, 2020, 01:26 AM IST

नई दिल्ली. अप्रैल-मई का मौसम है, जब पाकिस्तान सबसे ज्यादा घुसपैठ की कोशिशें करता है ताकि ज्यादा से ज्यादा आतंकियों को भारतीय सीमा में भेज सके। ये इसलिए क्योंकि इस मौसम में एंटी इन्फिल्ट्रेशन ऑब्स्टकल सिस्टम को ढंकने वाली बर्फ पिघलने लगती है और बर्फ के नीचे दबी फेंस में टूट फूट हो चुकी होती है। आतंकी इसका फायदा उठाकर आसानी से एलओसी पार कर लेते हैं।

यूं तो इस तरह के मूवमेंट रोकने के लिए एम्बुश लगाए जाते हैं, लेकिन जहां भी कुछ दरारें रह जाती हैं, आतंकी उसी का बेजा फायदा उठाते हैं। कल हंदवाडा में हुए एनकाउंटर में संभवत: आतंकी राजवार जंगल से घुसपैठ कर आबादी वाले इलाके में आ गए, जहां उन्हें ठहरने को सुरक्षित घर मिल सकें। वहां तैनात 21 राष्ट्रीय राइफल्स को इलाके में आतंकियों की मौजूदगी का इंटेलिजेंस अलर्ट मिला था। यूनिट की कंपनी, जिसमें कमांडिंग ऑफिसर भी शामिल थे को जब पता चला कि आतंकियों ने गांव के किसी घर को बंधक बना लिया है तो वे उस जगह पर पहुंच गए और आतंकियों के साथ मुठभेड़ शुरू हो गई।

इस तरह के ऑपरेशन्स में हर पल कुछ बदलता रहता है। इसके लिए सेना की एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर भी होती है। लेकिन ग्राउंड पर मौजूद हालातों के मुताबिक उन्हें बदलना पड़ता है। दो आतंकवादियों को मार गिराया था। जिन्हें बंधक बनाया गया था, उस घर के लोगों को सुरक्षित बाहर ले आए थे। लेकिन कमांडिंग ऑफिसर और उनकी टीम उस घर में फंस गई, जहां कुछ और आतंकी भी मौजूद थे।  

किसी भी ऑपरेशन में हाउस क्लीनिंग ड्रिल सबसे चुनौतीपूर्ण और खतरनाक होती है। ये वह ड्रिल है, जो राष्ट्रीय राइफल्स की यूनिट इस तरह के ऑपरेशन में पूरी करती है। यही वजह थी कि दो आतंकियों के मारे जाने के बाद भी ऑपरेशन चलता रहा, बाकी आतंकियों को ढूंढने और मार गिराने के लिए।

हालांकि काउंटर टेरेरिस्ट ऑपरेशन में यह एक बड़ा नुकसान है, जिसमें हमने एक कमांडिंग ऑफिसर, एक दूसरे ऑफिसर, दो जवान और एक पुलिसवाले को खोया है। जो खोया, वो पाने से कहीं ज्यादा था। इसके बावजूद जो फिलहाल हुआ और जो आंकड़ें हैं, उसका असर कॉम्बैट जोन के हालात पर नहीं पड़ना चाहिए।  जम्मू-कश्मीर में 1 अप्रैल से अब तक 30 आतंकी मारे गए हैं। दो घटनाओं में हमने 10 सैनिकों को खोया है। अब जब मौसम खुला है तो ऐसे कई एनकाउंटर होंगे और उम्मीद करते हैं आंकड़े भी सुधरेंगे।

लगातार इंटेलिजेंस रिपोर्ट मिल रही हैं कि आतंकवादियों के नेटवर्क की भारी तबाही हुई है और ओवर ग्राउंड वर्कर जो आतंकियों के मददगार होते हैं, उन पर दबाव है। रिपोर्ट ये भी है कि पाकिस्तान साउथ कश्मीर से ले जाकर नॉर्थ कश्मीर में आतंकवादियों को एक्टीवेट करना चाहता है। इसके लिए वह घुसपैठ की कोशिशें लगातार नॉर्थ से कर रहा है।

अफसोस है कि हमने अपने सैनिकों को खोया लेकिन इससे कोरोना के बीच भी जारी हमारे ऑपरेशन पर किसी तरह का असर नहीं पड़ना चाहिए। हल यही है कि कम से कम घुसपैठ हो और ज्यादा से ज्यादा आतंकवादियों और उनके आकाओं का खात्मा हो। अब कोरोना के चलते आतंकवादियों के जनाजों को बैन कर दिया गया है और अलगाववादियों की सड़कों पर आतंक फैलाने की राजनीति भी कंट्रोल में है तो बस यह ध्यान रखना होगा कि इस तरह के ऑपरेशन का फायदा कोई उठा न ले।

उन अफसरों ने जो किया, वहां के हालात के मुताबिक सही किया। वरना घरों में बैठकर उस परिस्थिति के बारे में किसी को भी कमेंट करने का हक नहीं है।

(लेखक कश्मीर में सेना के कोर कमांडर रह चुके हैं)

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